50 करोड़ साल पहले भारत मौजूदा स्वरूप में आया: 5 हिस्सों में बंटा था; 170 करोड़ साल पहले मध्यप्रदेश के आसपास महासागर था – Jaipur News

170 करोड़ साल पहले विभिन्न भारतीय विभागों स्थिति।

आज जो भारत का भू-भाग नक्शे पर देखते हैं, उसे बनने की प्रक्रिया 150 करोड़ साल पहले शुरू हुई थी। पूरा होने में 50 करोड़ साल लगे। तब हिमालय नहीं था। देश का मौजूदा भू-भाग दक्षिण में कर्नाटक-आंध्र व तेलंगाना, दक्षिण पूर्व में छत्तीसगढ़-ओडिशा, पूर्व में झारखं

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राजस्थान यूनिवर्सिटी के भू-वैज्ञानिक प्रो. एमके पंडित के निर्देशन में रिसर्च टीम द्वारा 18 साल तक किए शोध में यह खुलासा हुआ। उनके साथ फ्लोरिडा विवि के प्रो. जोसेफ मर्ट भी प्रमुख भूमिका में रहे। फ्लोरिडा की लैब में चट्‌टानों के पुराचुंबकीय गुणों और रेडियोधर्मी आयु की गणना हुई।

इसके लिए प्राचीनतम 5 भूखंडों की सैकड़ों चट्‌टानों से 2 हजार नमूने लैब में जांचे गए। रिसर्च को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता देते हुए प्रतिष्ठित रिसर्च जनरल ‘गोंडवाना रिसर्च’ ने इसे प्रकाशित किया है।

170 करोड़ साल पहले विभिन्न भारतीय विभागों की स्थिति
नक्शे से पता चलता है कि तीन प्रमुख दक्षिण भूभाग वर्तमान से दक्षिण में थे, इनकी आपस की स्थिति विभिन्न थी। समय के साथ उनकी स्थिति में परिवर्तन आया और यह खिसक कर उत्तरी भूभागों से जुड़ गए। पश्चिमी राजस्थान, थार, पाकिस्तान और ओमान अरावली से आकर जुड़ा और देश के भौगोलिक एकीकरण की प्रक्रिया 100 करोड़ साल पहले पूरी हुई।

प्रो. एमके पंडित भूतपूर्व प्रो. राजस्थान विवि। 2 बार भारतीय अंटार्कटिक अभियान दल के सदस्य रहे हैं।

प्रो. जोजफ मर्ट प्रो. फ्लोरिडा विवि। भू भौतिकी के क्षेत्र में रिसर्च के लिए कई अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप।

170 करोड़ साल पूर्व एमपी के आसपास वाले क्षेत्र में महासागर के प्रमाण मिले

  • रिसर्च में प्रमाण मिले कि 170 करोड़ साल पहले हालिया मध्य भारतीय क्षेत्र में एक महासागर था, जिसे टीम ने ‘गोटोसिंधु’ नाम दिया।
  • अभी तक एकीकरण की पुख्ता जानकारी नहीं थी। इससे दुनिया की प्राचीन स्थिति को लेकर सटीक शोध होने का रास्ता प्रशस्त हुआ।
  • पृथ्वी के स्वरूप, महाद्वीप और सागरों के विस्तार की पुरानी स्थिति जानने को लेकर दुनियाभर में रिसर्च हो रहे हैं।

इसी कड़ी में दोनों प्रोफेसर ने भारतीय भू-भाग पर अपना शोध केंद्रित किया। रिसर्च का प्रोजेक्ट तैयार कर ‘नेशनल साइंस फाउंडेशन, अमेरिका’ को सौंपा। यहां से मंजूरी मिलने के बाद फंडिग हुई। फिर शोध हुआ।